“वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः”
floral design
Rudraksha

नारायण नागबली

Rudraksha
roll roll
narayan nagbali

नारायण नागबली पूजा दो अलग-अलग कारणों से किए जाने वाले दो अलग-अलग अनुष्ठान हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार, नारायण बली पूजा मुख्यतः पूर्वजों की असंतुष्ट आत्माओं को मुक्त करने के लिए की जाती है, और नागबली पूजा को साँप को मारने के पाप को खत्म करने के लिए किया जाता है। ये दोनों अनुष्ठान केवल त्र्यंबकेश्वर मंदिर में ही की जाते है क्योंकि त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग अधिक पवित्र स्थान है, जहा शिवलिंग के रूप में तीन चेहरे भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान महेश का प्रतिनिधित्व करते है।

नारायण बली पूजा और नागबली पूजा का विस्तार में वर्णन:

नारायण बली पुजा

यदि कोई व्यक्ति का पीड़ित मृत्यु होता है, तो उस व्यक्ति की आत्मा भूत जीवन में प्रवेश करती है। यह नारायण बलि पूजा अनुष्ठान असंतुष्ट आत्माओ के मोक्ष के लिए की जाती है, जिससे जीवन का जन्म-मृत्यु चक्र की प्रगति होती है, और हमारे मृत, असंतुष्ट पूर्वजों के आत्माओ को मोक्ष मिलता है।

यह अनुष्ठान करते समय मृत व्यक्ति का "नाम" और "गोत्र" का उच्चार करना वर्जित है, इससे पूर्वजों के आत्माओ को पितृविहीन जीवन के रूप में भूत से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

यह पूजा करने से, संबंधित व्यक्ति को पुर्वजो के आशिर्वाद से पारिवारिक खुशी, वित्तीय वृद्धि, शादी और आदि प्रकार के सुख (स्वास्थ्य, शिक्षा, मन की शांति और लंबे जीवन) की प्राप्ति होती है। नारायण बली अनुष्ठान किसी भी व्यक्ति को आनंदमय और स्वस्थ जीवन जीने का और सभी प्रकार की समस्याओं से मुक्ति पाने का एक प्रभावी तरीका है।

नागबली पुजा

nagbali puja

नागबली अनुष्ठान प्राथमिकतः सांप को मारने के पाप से मुक्ति पाने के लिए की जाती है। यदि कोई भी व्यक्ति सांप को मारने के पाप का भागीदार है, तो उसे बहुत समस्याओ का सामना करना पड़ता है, जैसे की संतति प्राप्ति, स्वास्थ संबंधित समस्याएं, आदि।

कहा जाता है की, कुल चौरासी लाख जीवन और उसके चार महत्वपूर्ण अंग प्राणी जीवन में होते है, सांप / कोब्रा जीवन भी उनमेसे ही एक है। मानवी जीवन और सांप जीवन एक दूसरे से संबंधित है, जैसे महाभारत में दर्शाया गया है। (जब भगवान ब्रह्मदेव ने सात तपस्वियो की निर्मिति की उनमे से तपस्वी कश्यप को दो पत्निया थी, जिनमे से पत्नी काद्रु ने सांप को जन्म दिया और पत्नी विनीता ने बाज़ पक्षी को जन्म दिया, यह दृश्य मानवी जीवन और सांप जीवन का संबंध प्रदर्शित करता है)।


एतैत सर्पाः शिकंठ्भूषा लोकोपकाराय भुवं वहन्तः
भूतै समेता मणिभूषितांगाः गृण्हित पूजां परमां नमो वः।
कल्याणरुपं फणिराजमग्य्रं नानाफणा मंडलराजमानम
भक्त्यैकगम्यं जनताशरण्यं यजाम्यहं नः स्वकुला भिवृध्यै॥


योग के अनुसार, "कुंडलिनी" (मानव शरीर में मौजूद) को जागृत करके शरीर के उद्देश्यों को संचय किया गया है। "कुंडलिनी" की उत्पत्ति से, मनुष्य धर्मशास्त्रीय ज्ञान प्राप्त कर सकता है। यह एक सिद्धांत है कि जीवन और आत्मा एकजुट हो जाते हैं, और मानव उसकी "कुंडलिनी" ज्ञान द्वारा मानवता को प्राप्त करता है। धर्मशास्त्र में, कुंडलिनी को "साँप" के रूप में दर्शाया गया है, इसलिए कुंडलिनी और साँप की स्थिति आपस में संबंधित है।

यदि कोई जाने - अनजाने में अपने पिछले जन्म में सांप/ कोबरा की मौत का कारण बना, तो नागबली दोष का निर्माण होता है।

नारायण नागबली पूजा वर्णन

नारायण नागबली अनुष्ठान के लिए सर्वप्रथम क्रमशः "देहशुद्धि विधी" और "प्रायश्चित्त विधी" शरीर को पवित्र बनाने के लिए की जाते है। "देहशुद्धि विधी" करने वाले "कुशावर्त कुंड" या "कुशावर्त तीर्थ" नामक पवित्र तालाब में स्नान करके नए वस्त्र प्रधान करते हैं, और अनुष्ठान करने वाले नागबली पूजा फल के प्राप्ति के लिए भगवान श्री शिवा की पूजा करते हैं। नारायण बली अनुष्ठान पितृ श्राप और पापों से छुटकारा पाने के लिए किया जाता है।

नारायण नागबली पूजा करने के क्रमशः विधी

nagbali puja

प्रथमः नारायण नागबली पूजा करने के लिए "प्रधान संकल्प" और न्यास लिया जाता है, उसके बाद में कलश पूजा , धुप, दिप और भगवान श्री विष्णु की पूजा की जाती है।

प्रथम विधी के बाद, विष्णु तर्पण किया जाता है, जिसका अर्थ ये है की भगवान श्री ब्रह्मा , भगवान श्री विष्णु, भगवान श्री रूद्र, यमा और तत्पुरुषा की आराधना करना, उसके पहले पाँच देवताओं के जीवन को पाँच धातु मूर्तियों में स्थापित किया जाता है उसे हम "प्राणप्रतिष्ठा" कहते है ।

पूजा विधी करते समय प्राणप्रतिष्ठा , फिर अग्निस्थापन, पुरुषसूक्त हवन , एकादशा श्राद्ध , पंचदेवता श्राद्ध बलिदान , पलाश विधी , परं शर ,दशान्त कर्म कीये जाते है, उसके बाद एकोद्दिष्टा श्राद्ध , मासिक श्राद्ध , सपिण्डी श्राद्ध , नागबली प्रायश्चित्त संकल्प , नागदहन, अष्टबलिदान ऐसे विधी क्रमशः कीये जाते है।

हिंदू परंपरा के अनुसार, नागबली पूजा करते समय एक दिन के लिए अनुष्ठान करने वाले को छूने की अनुमति नहीं है, उसे "अशौच" या "सूतक" कहते है। भगवान श्री गणेश की पूजा अंतिम रूप से अशुभता को समर्पित करने के लिए "स्वस्तिपुन्यवचन" के रूप में की जाती है। सांप की सुवर्ण मूर्ति की पूजा की जाती है और पुजारियों को दान दिया जाता है। अंतिम विधी त्र्यंबकेश्वर मंदिर में भगवान त्र्यंबकेश्वर की पूजा करके की जाती है, इस तरह नारायण नागबली पूजा भगवान शिवा और पंडितो के आशिर्वाद के साथ पूरी होती है ।

नारायण नागबली पूजा के लाभ

हिंदू धर्म के अनुसार, अन्य सेवों की तुलना में पितृसेवा को अधिक महत्वपूर्ण स्थान है। यदि किसी व्यक्ति को अपने पितृ आत्मा के मुक्ति के लिए इस नारायण बली पूजा करता है, तो उन्हें अपने पूर्वजों का आशिर्वाद प्राप्त होता है।:

नारायण बली पूजा करने के सभी लाभ नीचे दिए गए हैं

  • अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति ।
  • पितृ दोष / शाप से छुटकारा।
  • पितृ दोष के हानिकारक प्रभावों को खत्म होना।
  • व्यवसाय और घरेलू इच्छाओ की पूर्ति।
  • संतान प्राप्ति संबंधित समस्याए दूर होना।
  • सांप के बुरे सपनों से छुटकारा।
  • मृत पूर्वजों द्वारा बनी समस्याएं दूर होना।
  • इस नागबलि अनुष्ठानों को करने वाले लोग सांप या कोबरा को मारने के पाप से मुक्त हो जाते हैं।

नारायण नागबली पूजा अनुष्ठान करने के लिए लगने वाला निधी

नारायण नागबली पूजा अनुष्ठान करने के लिए लगने वाला निधी निचे दिए गए मुद्दों पे निर्भर है

कुल निधी मुख्यतः नारायण नागबली पूजा करने के लिए लगने वाले अवधी (जैसे २ दिन विधी, ३ दिन विधी) और पूजा में आवश्यक सामग्री, होम सामग्री और आदि पूजा प्रकार (ऑनलाइन / ऑफलाइन) पर निर्भर है।

त्र्यंबकेश्वर पंडितजी


FAQ's

किसी व्यक्ति की अप्राकृतिक तरिके से मृत्यु हुई हो तो उसे मोक्ष दिलाने के लिए नारायण बली पूजा की जाती है, तथा नागबली पूजा सांप को मारने के पाप से मुक्त होने के लिए की जाती है।
अमावस्या , द्वादशी और पूर्णिमा के दिन पर त्र्यंबकेश्वर मंदिर में नारायण नागबली पूजा करना पुरोहितो द्वारा सुझाया गया है।
नारायण बली और नाग बली पूजा दोनों अलग अनुष्ठान है, जो ऊपर दिए गए अलग-अलग कारण के लिए किए जाते है।
यह पूजा करने से सभी पूर्वजो (जिनकी मृत्यु अप्राकृतिक तरीके से हुई है ) द्वारा निर्मित समस्याएं, शाप का नाश होता है, बुरे सपनों (अभिशाप और काले जादू ) से राहत मिलती है।
यह एक पुराणों में लिखी गयी पारंपरिक पूजा है जिसको पारंपरिक वस्त्र धारण करके ही करना चाहिए जैसे - पुरुषो के लिए धोती और महिलाओ के लिए साड़ी(सफेद रंग)।
प्राचीन हिंदू लेख धर्म सिंधु जिन्होंने बहुत से धार्मिक अनुष्ठानो का वर्णन किया है उनके के अनुसार नारायण नागबलि पूजा त्र्यंबकेश्वर मंदिर में ही करनी चाहिए क्योकि इसका संदर्भ "स्कन्द पुराण" और "पदम् पुराण" में भी किया गया है।
नारायण नागबली पूजा ये एक ३ दिन का अनुष्ठान है , जहा पुरोहितों द्वारा सुझाए गए पवित्र सामग्री को देवताओं को अर्पित किया जाता है, उनकी पूजा की जाती है।
whatsapp icon